बहुत अजीब-सा सवाल है न.. बिना मतलब हम किसी भी जगह आना-जाना नहीं चाहते। क्या यही सवाल सदी भर पहले किसी के जेहन में आया होगा। क्या पढ़ाई करने के लिए दूर-दूर जाने वाले पुरुषों ने ऐसे सवाल ख़ुद से पूछे होंगे? वह क्यों अपनी जगहों को छोड़कर एक अजनबी-सी जगह पर आकर रुक गए। क्या उन्हे पता था, वह कभी वापस नहीं लौट पाएंगे? आप ख़ुद अपने अंदर झाँककर देखिये। जवाब मिल जाएगा। क्या कभी आप अब उस जगह लौट जाना चाहेंगे? यह जो सारी पढ़ाई है, हमें विस्थापित करती है। हमारे मूलनिवासों से अलग करती है। यह सिर्फ़ उन यादों स्मृतियों को भूल जाना भर नहीं है, यह हमारे जातीय, सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों से कट जाने की सरल प्रक्रिया है। हमें इसका एंटी-थीसिस बनाना होगा।
फ़िर पता नहीं ऐसे कितने अनगिन सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते-घुमड़ते रहे होंगे। जिन्हे कहने के लिए न कभी शब्द मिले, न कभी मौके। यह उसी तरह कोरे कागज़ हैं, जहाँ हम उन सारी बातों को कह सकने की कोशिश कर सकते हैं। अभी यह कोई मुकम्मल शुरवात नहीं है। बस एक छोटा-सा कदम भर है। बहुत छोटा। चलना सीखने की तरह।
हम कहीं पहुँचने के लिए नहीं चलें हैं, बस चल पड़े हैं। अगर मुझे पता होता कहाँ पहुँचने वाला हूँ, तब तो कहीं से भी पढ़ने की ज़रूरत नहीं थी। अब इस तरह उन इमारतों से उन पर ऐसे सवाल निकलना और उन पर बात होना ज़रूरी है। बस यही कोशिश है कि एक नया नज़रिया हो जो शब्दों तसवीरों के जरिये यहाँ हमेशा उनके स्वर बनकर रहें जो हम कभी इन शोर वाले महानगरों में सुन भी नहीं पाते। यह मेरी रिसर्च के साथ-साथ बड़ी होने वाली मेरी डायरी भी है और उसके साथ पैदा होते सवालों का पुलिंदा भी। इसमें उलझने भी होंगी और उनके मेरी सीमाओं के अंदर जवाब भी। बस आख़िरी बात यह कि हम अपने ही देश में अपनी मातृभाषा में लिखते हुए यह भी महसूर करते हैं कि यह एक क्षेत्रीय भाषा में लिखा गया अनदेखा-सा विमर्श बनकर रह जाएगा। जबकि हम ढंग से अपने देश को ही इस पढ़ाई से नहीं जान पाये। लेकिन यह किसी भी तरह से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद न माना जाए न मेरे आदर्श कहीं सुनहरे अतीत में गड़े हुए हैं। यह एक क़िस्म का पोस्टमॉडर्न, सबऑलटर्न डिस्कोर्स है। बस।
{नोट: यहाँ पढ़ाई, शिक्षा का समानार्थी नहीं है, इसलिए मैं लगातार हर वाक्य को लिखते हुए कई बार सोचता फ़िर जाने देता। यहाँ पढ़ाई से सीधा-सीधा अर्थ ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के शैक्षिक तंत्र से है। अस्तु। }
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