शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

आदिवासियों की शिक्षा से जुड़े कुछ सवाल

हम लोग वहीं कैंटीन के पास अचानक मिल गए। बातों-बातों में पता चला वह ‘आदिवासियों की शिक्षा’ पर अपना एमफ़िल रिसर्च कर रही हैं। और उनके यहाँ भी ‘आधुनिकता’ के सवाल बिलकुल अलग तरीकों से आते हैं। वह बिलकुल भिन्न तरह के समाज हैं। यह हमारे समाजों की त्रासदी है कि हम किसी भी तरह इतने सालों में शिक्षा से गुजरते हुए इसतरह कभी उनसे परिचित नहीं हो पाते। हमारी शिक्षा प्रणाली कभी ऐसे अवसरों का निर्माण नहीं करती। फ़िर यह अजनबीपन हमें एक भौगोलिक राष्ट्र की सीमा में होते हुए भी कभी मिलने नहीं देता। उनके जीवन के सवालों से कभी हमारा आमना-सामना भी नहीं होता। यह अलगाव जितना हमारे समाजों में भरा रह जाता है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में जब हम जिस ‘शिक्षा’ की बात करते हैं, वहाँ इसके रूढ़ हो चुके अर्थ ही हमारे सामने खुलते हैं। हमारे अंदर ऐसी किसी व्यवस्था को चिन्हित कर लेने की इच्छा उठने लगती है, जिसे हम समान्यतः देखने के इतने आदी बना दिये गए हैं। तब उसके आगे सोचने का अवसर कभी आ ही नहीं पाते। हम वही ढूँढते हैं, जिसे हम अपने यहाँ देख चुके हैं। फ़िर यह सवाल और उलझ जाता है, जब हम ‘आधुनिकता’ के विमर्श को इस संदर्भ में खंगालते हैं। 

वहाँ से वापस लौटते वक़्त मेरे दिमाग में वेरियर एल्विन का नाम घूम रहा था। रानाजीत गुहा बहुत पहले सबआलटर्न इतिहास लेखन में एक स्थापित नाम रहे पर अब रामचन्द्र गुहा हरतरफ़ छाए हुए हैं। रामचंद्र गुहा की एक किताब है। Savaging the Civilized; Verrier Elwin, His Tribals, and India। पर इसे अभी तक पढ़ नहीं पाया हूँ। बस सोचता रहा पहले पहल यह सवाल कब टकराया होगा कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने का वक़्त आ चुका है? अब हम और जादा देर नहीं कर सकते। शायद नेहरू के वक़्त। औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन में कभी ऐसी पहल हुई यह बहस का विषय है। यह खुले संवाद का बिन्दु है। लेकिन आगे बढ़ने से पहले सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि स्वाधीन राष्ट्र-राज्य में जवाहरलाल नेहरू के आधुनिक भारत के निर्माण की वृहद परियोजना में आदिवासियों को कहाँ स्थित किया जाये? वह कहाँ खड़े होकर अपने आने वाले भविष्य को देख रहे थे? उनके हिस्से में यह विकास से टकराना रहा होगा या उसमे समायोजित हो जाना? इनके संबंध में वास्तविकता कभी इतनी एक रेखीय नहीं रही।

इस प्रश्न के कई उत्तरों में एक सिरे पर वह लोग थे जो आदिवासियों को इस देश का मूल निवासी मानते थे और आदिवासियों की पृथक जीवनशैली को बनाए-बचाए रखने के लिए उन्हे बाकी समाज से अलग रखे जाने के हिमायती थे। उनका मानना था कि उन्हे विकास की आधुनिक धारा में ला दिया गया तो उनका अस्तित्व नहीं बचेगा। अतः उन्हे अपनी संस्कृति और संसाधन बचाए रखने के लिए कुछ विशेषाधिकार दिये जाने चाहिए। दूसरे सिरे पर वह राष्ट्रवादी थे, जो आदिवासियों को पिछड़ा हिन्दू मानते थे और उन्हे समाज की मुख्यधारा में लाने का एक ही रास्ता था कि उन्हे भी समरूप समाज बनने का अवसर दिया जाये। यह अवसर उनके लिए विकास ला रहा था। यह उनके संसाधनों में राज्य की व्याप्ति के साथ स्वयं उनके अपदस्थ होने की शुरुवात थी।

भले आज इतने सालों बाद भी जवाब इन्ही रूपों के आसपास मिलते हों और पूंजीवादी विकास के दबावों ने उसे और तीक्ष्ण बना दिया है, जिससे जंगल और जमीन के सवाल लगातार उलझते गए हैं। इन बीते वर्षों में हम लगातार देख रहे हैं विकास की इस अवधारणा का प्रतिकार किस तरह हिंसक होता गया है। ‘राज्य’ भी इसके लिए कितना प्रतिबद्ध है और उसे प्रगति का सूचक मानता है कि अपने ही नागरिकों को उग्रवादियों के रूप में चिन्हित कर रहा है। स्पष्ट रूप से यह भीषण द्वंद्व की विस्फोटक स्थिति है, जिसका कोई हल निकट भविष्य में नहीं दिख रहा। यहाँ पहुँचकर हमारे हाथ में एक तरफ़ विकास की ऐसी अवधारणा है, जो राष्ट्र को आधुनिकता की तरफ़ ले जाने को आतुर है; तो दूसरे कोण पर वे लोग हैं, जो विकास को अपने अर्थों में अपनी शर्तों पर पारिभाषित करना चाहते हैं। उनकी जो छवियाँ हमारे सामाजिक स्मृति कोशों में तैर रही हैं उनमें वह एकतरह से यथास्थितिवाद है, जो विकास विरोधी रवैये को अपने अंदर पोषित कर रहे हैं। शायद उन्होने समवेशी विकास की अपनी समझ विकसित कर ली है, जो हमें नज़र न आ रही। सरल अर्थों में शायद वह अपने मूल स्थानों से ‘विस्थापित’ नहीं होना चाहते होंगे। लेकिन हम तबतक ‘शिक्षित’ होकर उनके प्रतिरोध और उनके प्रतिकार को विकास विरोधी मानकर अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते जाते हैं।

यहाँ तक आते-आते लग रहा होगा कि हम जिन शिक्षा के सवालों को लेकर शुरू में चले थे, वह उनकी मूलभूत समस्याओं में उलझकर रह गए। लेकिन यही हमारी दृष्टि का दोष है। कोई भी समाज निर्वात में अपने कार्यव्यापार सम्पन्न नहीं करता। उसका अतीत वर्तमान से गुजरकर उसके भविष्य को निर्मित करता है। यह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी रूप में उसे प्रभावित ज़रूर करता रहेगा। यह साफ़ दिख रहा है हमारे पास आज की तारीख़ में ऐसा कोई आलोचना नहीं है, जो उनकी तरफ़ से सीधे आती हो। अगर आती भी है, तो वह इतनी प्रत्यक्ष नहीं है। यही वह बिन्दु है, जहाँ हमें शिक्षा के साथ उन समाजों के सम्बन्धों को नए सिरे से देखने की ज़रूरत है। यह नए सिरे से आदिवासियों के संदर्भ में ज्ञानमीमांसा को गढ़ने का अवसर है। हमें ख़ुद से पूछना होगा कि क्या हमारे पास उनके सांस्कृतिक-सामाजिक परिवेश में व्याप्त ‘शिक्षा’ की कोई अवधारणा मौजूद है? या हमारे पास उन परिवेशों में राज्य द्वारा स्थापित ‘आदर्शशालाओं’ को उनकी शिक्षा मानकर, उनके भीतर उतरती आधुनिक शिक्षा की उत्तर-औपनिवेशिक छाया देखकर लौट आने के अलावे कोई और विकल्प नहीं है? 

इस विकल्पहीनता से निपटने का कोई उपाय हमारे पास उपलब्ध नहीं है। लेकिन अब वक़्त आ चुका है जब हम अपने समाजों के भीतर इसका एंटिथीसिस रचने की पहली कोशिश शुरू करें। यह शिक्षा द्वारा राज्य का वर्चस्व ही है, जिसमें हम कुछ नहीं कहते और इसतरह यह उनके हिस्से की आवाज़ों को दबाने के लिए अपनी मूक-सहमति दे देते रहे हैं। यह जटिल प्रक्रिया अपने भीतर हमारे इर्दगिर्द सैकड़ों और सवालों को उनसे मिलते जुलते कई सारे विमर्शों को अपने समेटे हुए है। आज उन्हे नए प्रस्थान बिन्दुओं से देखने की ज़रूरत है। वरना हम भोपाल स्थित मानव संग्राहलय की खुले आसमान के नीचे बिखरी वीथियों में घूमते हुए एक अलग अजनबी दुनिया में खुद को पाते हुए सोचने लगेंगे यह भी हमारी दुनिया का हिस्सा हैं पर हम इनके बारे में कुछ नहीं जानते। तब हमारा मन हमसे पूछेगा यह मिथक क्या होते हैं। और तब हम किसी लेवी स्ट्रास के पास पहुँच जाएँगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें